“घर की याद”

0

आज जब पूरा देश COVID-19 के संक्रमण से जूझ रहा है तो प्रत्येक व्यक्ति को अपना घर याद आ रहा है । हर व्यक्ति यह चाह रहा है कि वह अपने गाँव जल्द से जल्द पहुँच जाए ।हालांकि कुछ दिन पहले तक घर में अकेले रह रहे माँ-बाबूजी के बुलाने के बाद भी अधिकांश लोग घर नहीं जाना चाहते थे,क्योंकि उन्हें अकेले रहना पसंद है ,अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्हें बदलनी है।

कुछ लोग घर को लौट आये और घर पर रूकर अपने बचपन की यादों को तरोताज़ा कर रहे है । वह दिन , जो उन्होंने अपने दादा-दादी,चाचा-चाची के साथ बिताया था । बड़ों का सम्मान, अपनी भावनाओं को साझा करने का गुण, सबकी परवाह करना – ये संस्कार संयुक्त परिवार ही सिखाता है, आज अपने परिवार के बीच बैठ कर इन फुर्सत के क्षणों में उन सबको याद कर रहे है।

दूर रहनेवाले बच्चे और माता-पिता, जो केवल गुड मॉर्निंग और गुड नाइट कहा करते थे, आज जीभर के साथ रह रहे है । घर में छोटी – सी चीज के लिए होने वाली लड़ाइयां, उनको संयुक्त परिवार की यादों को ताजा कर दे रही है। अब माँ-बाप भी चाहते कि उनके बच्चे निजता की आदत से बाहर निकले और अपने अच्छे-बुरे अनुभवों को साझा करें ,वो तो बस ये चाह रहे कि उनसे बातें करे। संयुक्त परिवार की परंपराओं को सहेजें।

परंतु जैसे ही lockdown खत्म होगा एक बार फिर सभी के सभी अपने सपनों को नई उड़ान देने के लिए घर से निकलेगें । पर इसका मतलब यह नहीं कि लोगों का मन गाँव मे नहीं लगता है , वो तो उस ऊँचाई को छूने निकल जाते है जिस ऊँचाई पर चढ़ने की सीख बचपन से उनके माता-पिता देते रहे है । एक बात यह भी है कि आज के शिक्षितों को गांव के परंपरागत कार्य , अशिक्षितों के कार्य लगते है ,उनका आत्मसम्मान इन कार्यों को करने की अनुमति नहीं देता है। जीवन जिस तरीके से आगे बढ़ रहा है उस हालात में लोगों को न चाहते हुए भी अपनी मिट्टी से दूर परदेश में रहना पड़ता है,संयुक्त परिवार विच्छिन्न हो रहा है ,जमीन की माप कम होती जा रही है और तो और परंपरागत कार्यों पर निर्भर होकर आज के सामाजिक और आर्थिक हालत नहीं बदले जा सकते है । इन सबके अलावा भी कई कारण है जिससे व्यक्ति अपनी जन्मभूमि को छोड़ने के लिए मज़बूर है।

इस वैश्विक महामारी ने लोगों का बहुत कुछ छीन लिया है परन्तु हर एक व्यक्ति को उसके बचपन की यादों में पुनः लौटने का मौका दिया है और एक सबक मानव जाति को सीखा दिया कि प्रकृति को ना छेड़ो वरना प्रकृति जब छेड़ती है तो आज जैसे दृश्य चारों ओर प्रकट हो जाते है।

अंत मे इतना कहना चाहूँगा कि जहाँ रहिये खुश रहिये ,परिवार और प्रकृति से जुड़े रहिये।।

विकास कुमार
जवाहर नवोदय विद्यालय, सोनभद्र ,उत्तर प्रदेश