दरबारी विदुषको का अद्भुत संसार-शुभेन्दु भट्टाचार्य

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‘दरबारी विदुषक’ शब्द मन मे आते ही आंखों मे बीरबल और तेनालीराम की छवि उभर आती हैं। दरबारी विदुषको के किस्से न सिर्फ इतिहास की मुख्य धारा का हिस्सा है बल्कि इनकी कहांनिया कथा साहित्य को भी समृद्ध करते है। यहाँ तक कि , इतिहास के विधार्थी , विद्वान जहाँ अपना यौवन और प्रौढ़ावस्था , बादशाह अकबर ,राजा कृष्णदेव राय ,खलीफा हारून अल रशीद की उपलब्धियो को पढ़ने में खपाते हैं, वही उनके मधुर बचपन की यादें इन महान शासको के विदूषको के किस्सों की होती है।

दक्षिण एशिया के इतिहास मे उल्लिखित दरबारी विदुषको का रचना संसार सिर्फ हास्य प्रधान नहीं है बल्कि ये कहानियाँ शिक्षाप्रद, कटाक्षपूर्ण और मानवमात्र के उच्च जीवन मूल्यों का उत्सव भी प्रतीत होती है। ‘Shakespearean Fool’ की तरह इनकी कहानियों में जीवन दर्शन और सूझबूझ का पुट भी होता है।

श्रीलंका के कैंडी राज्य के राजा कीर्ति श्री राजसिंघे के दरबारी ,अंदारे,खलीफा हारुन अल रशीद के अश आब बहलोल,अबू नूवास ,महमूद गजनवी के दरबारी ,तहलक,शाह अब्बास के दरबारी इनायत और नसीर अल दीन शाह.के दरबारी करीम शीरी के किस्से न सिर्फ सुधी पाठको को गुदगुदाते है बल्कि ये भी दर्शाते है कि काल,सीमा जाति और देश से परे मानव मात्र के अनुभव और प्रतिक्रियाएं लगभग एक सी होती है।।

भारत मे दरबारी विदुषको की एक समृद्ध परंपरा रही है। मिथिलांचल के पं गोनु झा से लेकर बंगाल के गोपाल भाड तक के किस्से न सिर्फ कथा साहित्य का भंडार है बल्कि एक जैसे लगने वाले इनके किस्से क्षेत्रीय गौरव की अभिव्यक्ति भी लगते है। जैसे राजा परमर्दिदेव के वीर आल्हा , ऐतिहासिक पुरूष होते हुए भी आल्हा गान कल्पना का पुट लिए हुए है ,वैसे ही इन विदूषको की ऐतिहासिकता और इनसे जुड़ी कहांनियो के कल्पना संसार की महीन विभाजन रेखा समझ पाना लगभग नामूमकिन है।

दरबारी विदुषको की परंपरा मे सबसे. प्राचीन पं गोनु झा प्रतीत होते है। ‘ प्रत्युत्पन्नमति ( हाजिर जवाब) के रूप मे विख्यात पं गोनु झा का जन्म दरभंगा मे हुआ था। तेरहवीं शताब्दी के मिथिला के राजा हरी सिंह के समकालीन पं गोनु झा , मां काली के भक्त थे। ऐसी किंवदंती है कि एक.बार वाकपटुता मे इन्होंने मां काली को भी हरा दिया था।आज भी मिथिलांचल मे इनके किस्से बड़े चाव से सुने सुनाए जाते है।

बाबर के समकालीन ,विजयनगर के यशस्वी राजा श्रीकृष्णदेवराय के दरबारी तेनालीरामन को कौन नही जानता? ‘ विकटकवि’ के नाम से विख्यात तेनालीरामन ,राजा कृष्ण देव राय के अष्टदिग्गज कवियों मे से एक थे। ‘ पांडुरंग महात्म्य’ इनकी कालजयी रचना है ।

दरबारी विदुषकों के राजकुमार बीरबल का वास्तविक नाम ‘ महेशदास’ था और 1566 के आसपास,यें बादशाह अकबर की सेंवा मे आए और अपनी मृत्यु तक अकबर के स्नेह पात्र बने रहे। 1528 में जन्मे बीरबल की मृत्यु 1586 में पश्चिमोत्तर क्षेत्र के एक युद्घ अभियान में हुईं।

बीरबल की तरह अकबर के नवरत्नों मे एक मुल्ला दो प्याजा भी हाजिर जवाब और विनोदप्रिय थे।इनका उल्लेख 1892 मे उबैद इ जखनी द्वारा लिखित इनकी जीवनी मे मिलता है।

गोपाल भाड़ नदिया ( बंगाल) के राजा कृष्णचंद राय के दरबारी थे ।इनका बचपन दारूण कष्ट मे बीता ।ऐसी कथा परंपरा है कि ये भी कृष्णचंद्रराय के नवरत्नों मे से एक थे।ऐसा बताया जाता है कि राजा के दरबारी ‘ शंकर तंरग’ के वयक्तित्व पर गोपाल भाड़ का कथा संसार रचा गया था। इनकी लोकप्रियता इतनी अधिक है कि घुरनी( नदिया) में इनकी मूर्ति सथापित की गई हैं।बंगाल और बांग्लादेश के जन जन के प्रिय गोपाल भाड़ की ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

इसी प्रकार ओडिशा के जदुमनी महापात्र भी अपनी वाकपटुता के लिए विख्यात है। ‘ उत्कल घंट’ नाम से लोकप्रिय जदुमनी महापात्र एक व्यंगकार कवि भी थे। नयागढ के राजा विनायकसिंह मांधाता के प्रधानकवि ,दरबारी जदुमनी महापात्र ( 08/01/1781-02/07/1866) रीति काव्य के भी धनी थे।ओडिशा के घर घर मे इनकी कहानियां सुनाई जाती है।

समय बदलेगा, महान राजाओ और बादशाहों को इतिहास भूला देगा लेकिन इनके दरबारी विदुषको के रोमांचक मनमोहक किस्से , दादी- नानी की कहानियों मे स्थान पाते रहेंगे, क्योंकि शक्ति और बल नशवर हैं वहीं बुद्धि और नीति अमर है।
जय हिंद।।।

 

शुभेन्दु भट्टाचार्य
प्रवक्ता- अंग्रेजी
जवाहर नवोदय विद्यालय, चंदौली