दीप आशा के

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महादेवी वर्मा कहती हैं कि ” दीप मेरे जल अकंपित ” तो मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं “जल, रे दीपक ,जल तू / जिनके आगे अँधियारा है / उनके लिए उजल तू”

किंतु देश और दुनिया में जो अँधियारा छाया है वह अमावस के अँधियारे से कहीं अधिक घना है। अमावस का अँधियारा तो भोर के होते ही सूरज के कोरोना से काफ़ूर हो जाता है। किंतु आज का आसुरी कोरोना हताशा, निराशा और त्राशा का ऐसा वितान बन कर आच्छादित है कि हर तरफ घुप अँधेरा है। हर तरफ काला काल विराजमान है। आखिर इस आसुरी कोरोना के वितान को कौन फाड़े? कौन जलाए? हम तो सूरज नहीं हैं। हम तो कण मात्र हैं । फिर एक कण इस घुप अँधेरे को कैसे काटेगा? सोच -सोच कर सिहर जाता हूँ। कण-कण बिखर जाता हूँ। अरे! मुझे कुछ याद आया है। अभी -अभी कुछ याद आया है। हम कण-कण क्यों बिखर रहे हैं? क्यों न कण-कण को एक किया जाए। एक नया सूरज बनाया जाए। कण-कण से आशा का दीप जलाया जाए। सिर्फ एक दिन नहीं, हर दिन। सिर्फ 9 बजे रात नहीं। सिर्फ 9 मिनट नहीं। तब तक जब तक कि आसुरी कोरोना का वितान जल कर खाक न हो जाए। माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा है –

“सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें।”
दीप आशा के जलेंगें तो प्राण अवश्य फलेंगें।

 

“बच्चन जी ने कहा है कि –
क्या हवाएं थी कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरे शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना ।”

इसीलिए तो कह रहा हूँ कि आशा के दीप जलाओ।
संसार के उन अनेकों से निवेदन है कि एक होकर एकला रहें। इस वक्त घर में रहें। एक स्थान पर अनेक न रहें। घर-घर में आशा का दीप जलता रहे। आशा है तो जीवन है। ये अँधियारा जरूर मिटेगा और चारो ओर उजास फैलेगा। हम फिर से गले मिलेंगे। हाथ मिलाएँगे। ईद मनाएँगे। दीवाली मनाएँगे। होली खेलेंगे। अजान होगी।नमाज़ होगी। भजन होंगे। शिवाले भी गूँजेंगे। मगर अभी नहीं ।अभी हमें ठहरना है। आशा के दीप के साथ।

“शिक्षक की कलम से”
     राजेश यादव