ये जमाना हमें भले समझें घर उजाङने वाला पर हम तों बेजुबानो को भी साथ लेकर जीते हैं

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सार

यह कविता पिण्डरा क्षेत्र के रहने वाले परिवार पर ठीक बैठती है
यह परिवार मधुमक्खियों के छत्तो से शहद निकालने का कार्य कई पीढ़ियों से करता आ रहा है!

वाराणसी:- आते समय हमारी नजर सामने चल रही खुलें दार वाहन पर पङी जो अपनी मंजिल की ओर बढ रही थीं देखकर अचम्भित तब हुए जब एक पूरे परिवार के साथ कुछ बेजुबान जानवर भी दिखे हमने जब रोककर उनके बारें में जानकारी इकट्ठा किया तों पता चला इनका मुख्य कार्य दूर- दूर के जंगलों में जाकर शहद इकट्ठा करना होता है साथ में इनका पूरा परिवार भी उसमें मदद करता है जहाँ पर भी जातें है अपना डेरा लगाकर उस क्षेत्र में कुछ दिनों तक वही रहना होता है।

इनसे बातचीत करनें पर इनका दर्द साफ झलक रहाँ था इनकी बेबसी, लाचारी, गरीबी जो भी हो पर दिखा इनकी इमानदारी, इनका प्रेम जो कुछ बेजुबान इनके पालतू कुत्तों के लिए इनके हृदय में साफ झलक रहाँ था इन सभी का कहना था कि यें जानवर भी हमारे घर के सदस्य हैं जो कुछ भी शहद बेच कर मिलता हैं पूरे परिवार के साथ इन बेजुबानो का भरण-पोषण होता हैं जहाँ जाते है ले जातें हैं छोङ नहीं सकतें।

इनकी इमानदारी भी क्या खूब हैं
पर अगर जरूरत है तों इन जैसे परिवार को समाज के सहयोग कि।
जरुरत हैं तों सरकार के बनायें हुए सुविधाओं कि पर अफसोस है कि शायद मिले।।