संबंधों में दरार’

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जिंदगी दरख़्त-ए-गम थी, और कुछ नहीं।

ये मेरा हौसला है , कि दरम्यां से गुज़र गया।।

(अज्ञात शायर)

साथियों ,
आज मैं एक महत्वपूर्ण विषय पर अपनी राय रख रहा हूँ। कई महीनों से टीवी चैनेलों में दो मुद्दों पर पूरी गर्माहट से चर्चा चल रही है। एक है वैश्विक आपदा –

कोरोना और दूसरी है सुशांत सिंह ‘राजपूत’ की आत्महत्या।

कोरोना महामारी इंसानी लालच का प्रतिफल है, जो आगामी 2-3 महीनों में कम हो जाएगी। परंतु मैं जिस बीमारी पर लिख रहा हूँ , वह आज की युवा पीढ़ी में बढ़ती जा रही है। यह बीमारी संक्रमण के रूप में इसी तरह फैलती रही तो न जाने कितनी प्रतिभाओं को हम खो देगें।

सुशांत के विषय में कहा गया कि उन्होंने आत्महत्या की है। उन्होंने आत्महत्या की है या उनकी हत्या हुई है, यह आनेवाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। अगर मान लिया जाए कि उन्होंने आत्महत्या की है या उनकी हत्या हुई। है, तो यह परिस्थिति उत्पन्न कैसे हुई ? इस विचार किया जाना चाहिए।

बच्चे के जन्म के समय माँ कहती है कि ‘चंदा है तू , सूरज है तू ,ओ मेरी आँखों का तारा है तू।’ इसी तरह के अरमान एक पिता के भी होते है -‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा, तुझे फूल कहूँ या तारा, मेरा नाम करेगा रौशन जग में मेरा राज दुलारा’।

इन पंक्तियों से मां-बाप का अपने बच्चों के प्रति उनका अक्षय प्रेम प्रदर्शित होता है और जीवन की अंतिम घड़ी तक इस अतुलनीय प्रेम और स्नेह को बनाये रखते है, पर क्या समाज में आज की पीढ़ी अपने जन्मदाता के प्रति सम्मान और आदर बनाये रख पा रही है ? यह एक यक्ष प्रश्न बन चुका है।

जिंदगी में सफल होने के लिए हम बहुत ठोकरें खाते है , गिरते रहते है, यहां तक कि हमारा मनोबल टूट जाता है। उस विषम परिस्थिति में अगर कोई सम्बल देता है, तो वो हमारे सच्चे दोस्त, हमारा परिवार और सबसे बढ़कर हमारे माता-पिता होते है। परंतु दुर्भाग्य है कि सफलता मिलने पर उसकी चकाचौंध में हम अपने इन्हीं रिश्तों को बोझ समझने लगते है।

हम रिश्तों का एक नया संसार बनाने लगते है जोकि हमारी सफलता के अनुरूप हो। इन रिश्तों में कुछ ही विश्वास की कसौटी पर खरे उतर पाते है जबकि ज्यादातर तो आपकी सफलता से खींचे चले आते है। जिनका एक मात्र मकसद सिर्फ और सिर्फ अपना हित साधना होता है।

जैसे फूल खिलने पर उसका पराग लेने के लिए अनेकों भौरें मँडराने लगते है और उसके सूखते ही गायब हो जाते है। वैसे ही आज के इस भौतिकवादी संसार मे भौरें रूपी मानव बहुत है। फूल की खुशबू समाप्त होने पर भौरें अन्यत्र चले जाते,पौधों को क्षति नहीं पहुँचाते है, परंतु ये मानवीय भौरें आपके कठिन समय मे आपको सहारा देना तो दूर आपको दफनाने की फ़िराक में रहते है।

साथियों जिन्होंने अपनों से दूरियां बनाई है, वह जीवन में धोखा अवश्य खांए है। जो रिश्ते छोटपन में हम पर लगाम लगाकर, सही-गलत की सीख देते है, यदि वही हमारे जीवन से दूर हो जायेगें तो फिर अच्छे-बुरे की पहचान न कर पाने पर कौन हमे समझायेगा ?

एक साक्षात्कार में हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी धनराज पिल्लै से पूछा गया कि ‘आपकी माँ द्वारा दी गयी कोई सीख ,जो आपकी जिन्दगी में काम आई हो’। तो उन्होंने कहा-‘ मेरी माँ ने मुझे सीखाया कि मैं अपनी सफलता को कैसे सँभालू। किसी ने क्या खूब कहा है कि-‘ बुलंदियों पर पहुँचना कमाल नहीं, बुलंदियों पर ठहरना कमाल है’।

सफल हुए नहीं कि पीछे मुड़कर अपनों को देखना भूल जाते है (सब पर यह बात लागू नहीं होती)। एक सफल, प्रतिभावान, सुंदर एवं सुशील इंसान अपनों से कुछ पल के लिए दूर क्या हुआ, कि जिंदगी ही उससे दूर हो गई।

इस घटना के बाद गौर से सोचा तो पाया कि कई सफलतम इंसान है, जो अपनों से जुड़े ही नहीं है वरन उनके साथ आज भी रहते है (शायद वह उनके तथाकथित सम्भ्रान्त समाज मे अनूकुल न हो फिर भी) और तब तक उनके साथ रहे है जब तक जिंदगी ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

मुकेश अम्बानी, धर्मेंद्र, जितेन्द्र, सचिन तेंदुलकर, अभिताभ बच्चन, सलमान खान ,धनराज पिल्लै, ऐसे कई नाम है, जिनको सँवारने और सफल बनाने वाले इनके परिजन आज भी इनके साथ जुड़े है। इन सफल व्यक्तियों ने अपने रिश्तों को नहीं छोड़ा, तो सफलता और जिंदगी ने भी इनका साथ नहीं छोड़ा।

खूब मेहनत करिये, खूब पैसा कमाइये, खूब शोहरत बटोरिये, पर रिश्तों की बलि देकर नहीं। रिश्तों को ठुकराया जाना अवसरवादियों के लिए सुनहरा मौका बन जाता है। यह प्रवृत्ति नहीं रुकी तो आनेवाले समय मे एक महामारी का रूप धारणकर संक्रमण फैलाएगी जो भावी पीढ़ियों को खोखला बना देगी।

अतः जिंदगी को खुद के लिए जंग का मैदान ना बनाईये।, खुद के लिए और अपनों के लिए सुकुन और उल्लास का उपवन बनाइये, क्योंकि एक दिन सब कुछ यहीं रखकर हम सब मस्ती के साथ चले जायेंगे, तब ना खुद से जंग होगी और ना ही कोई तकलीफ होगी। अपने घर के बुजुर्गों के साथ वक्त बिताइए, उनका तजुर्बा हमे वक़्त के पहले बहुत कुछ सीखा देता है। किसी ने बहुत ही अनुकरणीय बात कही है कि-

‘दुनिया का सबसे भरोसे का सौदा, बुजुर्गों के पास बैठना है,

क्योंकि वे चंद लम्हों के बदले आपको जीवन भर का तजुर्बा दे देते हैं ‘।

 

उमेश कुमार सिंह
(अध्यापक)
जवाहर नवोदय विद्यालय, सोनभद्र