स्वामी विवेकानंद जी 30 वर्ष की आयु में ब्रह्म समाज से परिचित हुए

स्वामी विवेकानंद जी 30 वर्ष की आयु में ब्रह्म समाज से परिचित हुए।
स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और 30 वर्ष की आयु में सार्वभौमिक पहचान दिलाई।
स्वामी विवेकानंद के बारे में भारत के युवा क्या जानते हैं कितना जानते हैं शायद यह बहुत कम ही होगा आज उनकी जन्म जयंती के शुभ अवसर पर आइए कुछ खास जानते हैं उनके बारे में।
     स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन 18 सो 63 को कोलकाता में हुआ था उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था, उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त का निधन 18 से 84 में ही हो गया था। जिसके चलते घर की आर्थिक दशा बहुत ही खराब हो चली थी। मात्र 39 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई उन्नीस सौ दो को उनका निधन हो गया।
विवेकानंद जी को संगीत साहित्य दर्शन तैराकी घुड़सवारी कुश्ती इन सबमें स्वामी विवेकानंद जी की विशेष रूचि थी। स्वामी विवेकानंद जी 25 वर्ष की आयु में वेद पुराण, बाइबल कुरान, धर्म पद, तनख, गुरु ग्रंथ साहिब , दास कैपिटल, पूंजीवाद, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, साहित्य संगीत और दर्शन की तमाम तरह की विचारधाराओं को उन्होंने अपने मानस पटल पर रच लिया था। विजय से जैसे बड़े होते गए सभी धर्म और दर्शनों के प्रति अविश्वास से भर गए, संदेश वादी उलझन और प्रतिवाद के चलते किसी भी विचारधारा में उनको विश्वास ही नहीं होता था।
स्वामी विवेकानंद जी का ब्रह्म समाज से जुड़ाव
स्वामी विवेकानंद जी की बुद्धि बचपन से ही तीव्र थी, परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी इस हेतु वह पहले समाज में गए किंतु वहां उनके चित्र को संतोष नहीं हुआ, फिर वह रामकृष्ण परमहंस की शरण में गए और अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए ब्रह्म समाज के अलावा कई साधु संतों के पास भटकने के बाद अंततः उन्हें राम कृष्ण के रहस्यमय व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया,जिससे उनका जीवन बदल गया और उन्होंने 18 सो 81 में रामकृष्ण को अपना गुरु बनाया संन्यास लेने के बाद इनका नाम स्वामी विवेकानंद हुआ।
    रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर स्वामी विवेकानंद उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे, किंतु परमहंस जी ने देखते ही पहचान लिया कि तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार था परमहंस जी की कृपा से इनको आत्मसाक्षात्कार हुआ और फल स्वरुप नरेंद्र दत्त परमहंस जी के शिष्यों में परम शिष्य हो गए ‌
  स्वामी विवेकानंद जी के हृदय में नारियों के प्रति विशेष सम्मान।।
स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो के भाषण में बताया की किसी भी देश की प्रगति का पता वहां के नारी सम्मान से पता चलता है कि यह देश कितना प्रगतिशील है , जिस दिन प्रत्येक पुरुष के अंदर नारी के लिए मातृत्व की भावना का समावेश होगा उस देश में नारियों पर अत्याचार, अनाचार व्यभिचार, बलात्कार दुराचार जैसी अमानवीय घटनाओं पर रोक लगेगी और वह देश अपनी सभ्यता और संस्कृति में उच्च शिखर में अपने प्रगतिशील संस्कारों का परचम लहरा कर संपूर्ण विश्व में प्रथम स्थान कहलाने के योग्य होगा।
    संकलन एवं प्रस्तुति
     सरिता पाण्डेय तुलसी तीर्थ राजापुर