राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर ॑ पुण्य स्मृति दिवस पर नमन श्रद्धांजलि..

 

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर ॑ पुण्य स्मृति दिवस पर नमन श्रद्धांजलि..

 

हिंदी साहित्य जगत के प्रसिद्ध कवियों में से एक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर। बिहार की धारा नहीं संपूर्ण भारत को एक से एक नायाब हीरे तरह से हैं ऐसे ही एक साहित्य जगत के कोहिनूर थे स्वर्गीय श्री रामधारी सिंह दिनकर जी, दिनकर जी का जन्म 23 सितंबर 1960 को सिमरिया नामक स्थान पर हुआ था, इनकी मृत्यु 24 अप्रैल, 1974 को चेन्नई में हिंदी साहित्य जगत के महान कलमकार रामधारी सिंह दिनकर ने इस संसार से विदा लेते हुए हिंदी साहित्य जगत का महान सितारे की चमक तो डूबी लेकिन अपने पीछे छोड़ गए अनगिनत वह रचनाएं जो हमारी आज की पीढ़ी को एक ऊर्जा प्रदान करती है। उनकी पुण्य स्मृति में उनकी लिखी एक कविता आग की भीख आपके सामने प्रस्तुत करती हूं यही हमारे लिए ऐसे महान कवि के लिए एक छोटी सी श्रद्धांजलि है।
।‌।कविता आग की भीख।।
धुंधली हुई दिशाएं छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआं सा।
कोई मुझे बता दे क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है।
दाता पुकार मेरी संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे सोए देश के हित अंगार मांगता हूं,
चढ़ती हुई जवानी यों का श्रंगार मांगता हूं।
बेचैन है हमारे सब और बेकली है,
कोई नहीं बताता किश्ती किधर चली है।
मझधार है, धमाल पास है किनारा,
यह नाश आ रहा है सौभाग्य का सितारा।
आकाश पर अनार से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान इस तरी को भरमा न दे अंधेरा ।
तुम बेधनी किरण का संधान मांगता हूं,
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान मांगता हूं।
आगे पहाड़ कोपा धारा रुकी हुई है,
बल पुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है।
अग्नि स्फुलिंग रज का मुझे ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी अंधेर हो रहा है।

निर्वाक है हिमालय गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्य-नाद भीषण विकराल मांगता हूं,
जड़ता- विनाश को फिर भूचाल मांगता हूं।
मन की बधी उमंगे असहाय जल रही हैं,
अरमान आरजू की लाशे निकल रही है।
भीगी खुली पलों में राते गुजारते हैं,
सोती वसुंधरा जब तुझको पुकारते हैं।
इनके लिए कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान मांगता हूं,
विस्फोट मांगता हूं तूफान मांगता हूं।
आंसू भरे द्रगो में चिंगारियां सजा दे,
मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीने के आर पार कर दे,
हिम शीत प्राण में एक अंगार स्वच्छ भरदे।
आमर्ष को जगाने वाली सीखा नयी दे,
अनुभूतियां हृदय में दाता अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार मांगता हूं,
बेचैन जिंदगी का मैं प्यार मांगता हूं।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उस पर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जांच की घड़ी में निष्ठा कड़ी अचल दे‌।
हम दे चुके लहू है, देवता तू विभा दे,
अपने अनल -विशिख से आकाश जगमगादे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान मांगता हूं,
तेरी दया बीपद में, भगवान मांगता हूं।
बस चढ़ती हुई जवानी यों का श्रंगार मांगता हूं।

‘राष्ट्रकवि रामधारी दिनकर जी’ ने 1943 में इस कविता को लिखा जरूर उनके हृदय में उस समय अपने देश के लिए अंतर्मन में स्वाभिमान की ज्वाला धधक रही होगी जिसको उन्होंने अपने कलम के माध्यम से कागज का सहारा लेते हुए अक्षरों में अमर कर दिया ऐसे महान कवि को हम शत शत नमन करते हैं।


प्रस्तुति एवं संकलन
सरिता पान्डेय
तुलसी तीर्थ राजापुर चित्रकूट उत्तर प्रदेश

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