हे अश्रु मेघ!

हे अश्रु मेघ!

 

हे अश्रु मेघ…
तुम शिव की आँखों में बसे प्रतीक्षा हो, पीड़ा हो,
तो मैं पलक हूँ, प्रेम हूँ, शक्ति का, तुम्हें घेरे हुए!

तुम्हारे रुदन से भीग जाता है मेरा अंतर,
विचलित हो उठता है मन
तुम बरस कर शांत हो जाते हो
और मेरा भीगा हुआ अंतर
बोने लगता है बीज प्रेम का!

प्रतीक्षा लिख रही है
नित नेह भरे शब्दों के अंकुरण में
विरह वेदना का अंत….
जब फूट पड़ेंगी कोपलें दो प्राणों को समेटे हुए
एक दर्पण में हम साथ इन्हें निहारेंगे
और नित्य सींचा करेंगे प्राण पीयूष से!

हे अश्रु मेघ!
तुम बरसना उस क्षण
प्रतिक्षण का हिसाब लिए
धो देना मन पर लगे सारे घाव
हम औषधि बन कर….
घुल जाएंगे तुम्हारे हर एक बूंद में!

-कृति चौबे
रावर्ट्सगंज,सोनभद्र