इत्थम मंदाकिनी गंगा द्वितिया च पयस्वनी तृतीया पुण्य गायत्री तिस्त्रः गंगा धरातले !!

इत्थम मंदाकिनी गंगा द्वितिया च पयस्वनी !
 तृतीया पुण्य गायत्री तिस्त्रः गंगा धरातले.   !!

शिखर नंदिनी (शिखर से जन्म लेने वाली) नदियां तेज स्वरूपा होती हैं इनका जल तन मन एवं आत्मा को तृप्त करता है।
देश के प्रायः तीर्थ नदियों के किनारे स्थित है नदियों के किनारे बसने वाले गांव समृद्ध शाली, प्रभावशाली, एवं प्रतिभाशाली होते हैं। जैसे सरयू के के किनारे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि, वाराणसी में गंगा तट में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ भव्य विशाल मंदिर एवं रामचरितमानस की रचना का स्थान, प्रयागराज में गंगा जमुना सरस्वती का मिलन, मथुरा में सर्वेश्वर भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर की नगरी शिप्रा नदी के किनारे जो महा कवि कालिदास की जन्म स्थली उज्जैन, गोदावरी नदी के किनारे नासिक जो मानव के मन मस्तिष्क को मोक्ष और भगवत प्राप्ति एवं आत्म चिंतन मैं तृप्त होने अनुभव कराती हैं।
भारतीय मान्यता के अनुसार प्रत्येक पदार्थ के दो रूप होते हैं आधिभौतिक रूप और आधि दैविक रूप, इस मान्यता के अनुसार नदियों के भी दो रूप हैं आधिभौतक रूप में नदियों का स्वरूप जल है और जल का एक नाम जीवन भी है इस नाते जल में जीवनी शक्ति होती है जल से शरीर की आंतरिक उष्मा शांत होती है।

अधिदेविक रूप में नदियां देवी स्वरूपा होती हैं, उनके जल के देवता वरूण होते हैं वह जल के आधिकारिक देवता होते हैं इसलिए नदियों के जल में दिव्य शक्ति होती है। इसमें पापों को धोने की अद्भुत शक्ति अंतर्निहित होती है इसलिए भारतीय संस्कृति में नदियों का बड़ा सम्मान है ‌‌।

  • मंदाकिनी नदी

मंदाकिनी नदी चित्रकूट की प्रमुख नदी है धार्मिक दृष्टि से यहां इसका महत्व उतना ही है जितना प्रयागराज तीर्थों में भगवती गंगा का है मंदाकिनी स्वयं में गंगा स्वरूप है। यह देवलोक की गंगा की ही एक धारा है जिसे ऋषि अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया ने कठिन तपस्या करके प्राप्त किया था और चित्रकूट में प्रवाहित किया था मंदाकिनी नदी के कारण चित्रकूट की महिमा में वृद्धि हुई है, मंदाकिनी के किनारे ऐसे स्थल हैं जो यात्रियों और पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।

मंद आकति या सा मंदाकिनी
इस व्युत्पत्ति से जो धीरे-धीरे बहती हो उसे मंदाकिनी कहते हैं। मंदाकिनी नदी सुरेश्वरी गंगा की धारा है, पूज्य पाद गोस्वामी तुलसीदास जी अपने रामचरितमानस में लिखते हैं

सुरसरि धार नाम मंदाकिनि


ग्रंथों के अनुसार चित्रकूट में एक बार 10 वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा है । अनावर्षन के कारण सारे जलासय सूख गए। हरियाली नष्ट हो गई ,फल फूल का अभाव हो गया, तब महर्षि अत्रि की पत्नी सती अनुसूया ने घोर तपस्या की अनुसूया की इस तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उपस्थित होकर बोले देवी तुमने इतना कठोर तप किया है वरदान मांगो, निवेदन करती हुई सती अनुसुइया बोली भगवान जला भाव के कारण चित्रकूट में ऋषि मुनि पशु पक्षी पेड़ पौधे सब बहुत दुखी हैं मैं चाहती हूं देव गंगा की धारा चित्रकूट में प्रवाहित कर दें ब्रह्मा जी ने कहा ऐसा ही होगा और ब्रह्मा जी ने देव नदी गंगा जी से प्रार्थना की हुआ है अपनी एक धारा को चित्रकूट में भेज दें तब कलरव करती कल कल मंदाकिनी चित्रकूट में बहने लगी।

पयस्वनी नदी

चित्रकूट की दूसरी महत्वपूर्ण नदी पयस्वनी हैं। इसकी उत्पत्ति ब्रह्माजी द्वारा संपादित यज्ञ के अभिषेक से हुई है ‌। प्रायः लोग पयस्वनी को ही चित्रकूट की प्रमुख नदी चित्रकूट की प्रमुख नदी जानते हैं। उनकी समझ में पयस्वनी का दूसरा नाम मंदाकिनी है जबकि ऐसा नहीं है राघव प्रयाग घाट के बाद चित्रकूट से यमुना नदी में उनके अंतिम होने तक इस नदी को सर्वत्र लोग पर पयस्वनी नदी से ही पुकारते हैं इसका का उद्गम चित्रकूट के दक्षिण भाग में चिकनी परिक्रमा मंदिर के समीप ब्रह्म कुंड से हुआ है परिक्रमा मार्ग में स्थित तुलसीदास जी के पीपल वृक्ष के ही पास स्थान है ।यहां से निर्गत हो कर पयस्वनी पूरवाविमुखी होकर पूरी यानी ब्रम्हपुरी के समीप राघव प्रयाग घाट में मंदाकिनी नदी में मिल गई है उद्गम एवं संगम स्थलों के बीच की जलधारा कहीं-कहीं तल्लीन होकर मंदाकिनी तक आई है।

गायत्री नदी

जिस प्रकार मंदाकिनी नदी तथा पयस्वनी नदी का आविर्भाव आध्यात्मिक अनुष्ठानों के फल स्वरुप हुआ है।उसी प्रकार चित्रकूट की तीसरी नदी गायत्री का उद्भव हुआ है गायत्री नदी बहुत छोटी तथा अल्पा है और एक कुल्या नाला के समान ही है धार्मिक दृष्टि से इसका भी बड़ा महत्व है यह पवित्र नदी ब्रम्हपुरी स्थित बेदी नामक स्थान से होकर पश्चिमभि- मुखी फिर दक्षिणभिमुखी और फिर पूर्वाभिमुखी होकर उसी जगह मिल जाती है जिस जगह पयस्वनी नदी मिली है इस प्रकार उस जगह पयस्वनी,मंदाकिनी और गायत्री इन तीनों नदियों का संगम हुआ है इसे राघव प्रयाग घाट कहा जाता है।

तर्क

भगवान राम की तपोस्थली चित्रकूट धाम की शोभा हमेशा से अविस्मरणीय अकल्पनीय रही हैं। जिस मंदाकिनी में ऋषि-मुनियों सहित मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लक्ष्मण माता जानकी सहित 12 वर्षों तक तप किया मां मंदाकिनी का पूजन अर्चन किया, आज उन्हीं मां मंदाकिनी की सत्ता सियासत के जिम्मेदारों ने उनकी पवित्रता के साथ खिलवाड़ किया है।
एक तरफ प्रशासन धार्मिक मूर्तियों को विसर्जन करने में रोक लगाता है जबकि वह मूर्तियां जल को अशुद्ध नहीं करती, और दूसरी तरफ पौराणिक धार्मिक नदियों में सीवर का पानी गिरा कर उन्हें अशुद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते आज नदियों की क्या दुर्दशा है यह अत्यंत पीड़ा दाई बन चुकी है। बड़े-बड़े अभियान चले, नदियों के स्वच्छ बनाने के बड़े-बड़े राजनैतिक मंचों से संकल्प लिए गए लेकिन नदियां उसी तरह बिचारी गंदगी और अशुद्धता बोझ ढो रही हैं।

लेखिका सरिता पान्डेय
  राजापुर (चित्रकूट)